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अर्द्ध-विकसित देशों के आर्थिक विकास में तकनीकी की भूमिका का वर्णन

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 @shilusinha

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अर्द्ध-विकसित देशों के आर्थिक विकास में तकनीकी की भूमिका का वर्णन

अल्पविकसित राष्ट्र अपने संसाधनों का सही तरीके से उपयोग करके तेजी से विकास करने का प्रयास करते हैं। उनके लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे सही तकनीक और प्रौद्योगिकी का चयन करें। अल्पविकसित राष्ट्रों की मुख्य समस्या यह होती है कि वे अपने आर्थिक और उद्योगिक विकास को बढ़ाने के लिए उपलब्ध संसाधनों का सबसे अच्छा रूप से उपयोग नहीं कर पाते हैं। इस स्थिति में, उन्हें उत्पादन की तकनीक का चयन करना होता है जो उनके पास उपलब्ध उत्पादन संसाधनों के साथ सही संयोजन में अधिक सफलता प्राप्त कर सकती है।

डॉ. ए. के सेन के अनुसार, "आधुनिक योजना की सफलता निर्यात व्यापार और योजना के रूप पर नहीं निर्भर करती है, बल्कि यह नियोजन के लिए चुनी गई तकनीक पर निर्भर करती है। यदि किसी कारणवश गलत तकनीक का चयन किया जाता है, तो यह न केवल योजना की असफलता का खतरा बढ़ाता है, बल्कि योजना के प्रति विश्वास भी कम हो सकता है।" इसलिए, तकनीक का चयन योजना की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आमतौर पर, हर प्रकार की अर्थव्यवस्था के लिए एक ही तकनीक का सहारा नहीं लिया जाता, बल्कि यह तकनीक उनके उद्देश्यों और संसाधनों के आधार पर अलग-अलग होती है।

तकनीक के प्रकार (Types of Technique):-

सामान्य रूप से तकनीक का वर्गीकरण निम्नवत् किया जाता है :
(i) श्रम प्रधान तकनीक
(ii) पूंजी प्रधान तकनीक

अर्द्धविकसित और पूँजी-प्रधान तकनीक:

अर्द्धविकसित देशों में तकनीक के चयन की समस्या काफी जटिल है। यहाँ पर कुछ विशेष अर्थशास्त्री लोग श्रम-प्रधान तकनीक का समर्थन करते हैं, जैसे कि प्रोफेसर नर्म्स, लूइस, येल ब्रोजन, किंडलबस्गर, कुजनेट्स, बर्ट होसलिट्ज, मेयर और वाल्डविन, और अन्य। उनका कहना है कि अर्थव्यवस्था के विकास के लिए श्रम-प्रधान तकनीक अधिक सहायक हो सकती है।

श्रम-प्रधान तकनीक के पक्ष में तर्क:

अर्द्धविकसित देशों में श्रम-प्रधान तकनीक के पक्ष में कुछ तर्क निम्नलिखित हैं:

I.रोजगार के अवसर: इस तकनीक के अपनाने से अधिक लोगों को रोजगार की अधिक संभावना होती है। क्योंकि श्रम-प्रधान तकनीक छोटे उद्योगों और कुटीर उद्योगों के विकास को बढ़ावा देती है, जिससे प्रत्येक क्षेत्र में अधिक रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।
II.आत्मनिर्भरता: श्रम-प्रधान तकनीक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है, क्योंकि यह विदेश से तकनीकी ज्ञान और मशीनों की आवश्यकता को कम करती है।
III.मुद्रा-स्फीति कमी: श्रम-प्रधान तकनीक से उत्पादित वस्तुओं की अधिक उपलब्धता होती है, जिससे मुद्रा-स्फीति को कम किया जा सकता है।
IV.विकेन्द्रीकरण: इस तकनीक के साथ उपभोक्ता, संसाधनों का संकेन्द्रण नहीं करते हैं, जिससे शहरों के बढ़ते गर्मी और अत्यधिक विकेन्द्रीकरण की समस्या को कम किया जा सकता है।
V.उपभोग का ऊँचा स्तर: श्रम-प्रधान तकनीक में मजदूरों का स्तर ऊँचा होता है, जिससे उनके उपभोग का स्तर भी बढ़ जाता है।
VI.फैक्ट्री सिस्टम के दोषों से मुक्ति: यह तकनीक प्रदूषण और शहरीकरण की समस्या से बचाव करती है, क्योंकि छोटे उद्योग और कुटीर उद्योग प्रदूषण को कम करते हैं।
VII.आयात में कमी: श्रम-प्रधान तकनीक में विदेशी मुद्रा की कमी होती है, क्योंकि आयात की आवश्यकता कम होती है।
VIII.सामाजिक लागतों कमी: इस तकनीक में सामाजिक उपरिव्यय कम होती है, क्योंकि मकान, यातायात, आदि की कम आवश्यकता होती है।
IX.प्रशासनिक साधनों की बचत: श्रम-प्रधान तकनीक से होने वाले उत्पादन में छोटे जगह और कम श्रम की आवश्यकता होती है, जिससे प्रशासनिक साधनों की बचत होती है।
X.शीघ्र उत्पादन: इस तकनीक के साथ उत्पादन का प्रारंभ त्वरित होता है, क्योंकि यह छोटे पैमाने पर होता है।
XI.शहरी-ग्रामीण संतुलन: श्रम-प्रधान तकनीक से उत्पादन में शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में समान संतुलन बना रहता है।
इन तर्कों के साथ, श्रम-प्रधान तकनीक के पक्ष में कई सारे आर्थिक और सामाजिक लाभ हो सकते हैं।

पूँजी प्रधान तकनीक के पक्ष में तर्क:

पूँजी प्रधान तकनीक के पक्ष में कुछ तर्क निम्नलिखित हैं, और ये तर्क इस तकनीक के प्रयोग के महत्व को दर्शाते हैं:
I.तेज आर्थिक विकास: पूँजी प्रधान तकनीक का प्रयोग करने से राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है, क्योंकि उपक्रमियों के पास अधिक धन होता है और वे अधिक बचत और निवेश करते हैं, जिससे आर्थिक विकास की गति तेज होती है।
II.जीवन-स्तर में वृद्धि: पूँजी-प्रधान तकनीक के कारण उपक्रमियों की लागत कम होती है, जिससे वस्तुओं की कीमत घटती है और जीवन-स्तर में वृद्धि होती है।
III.उत्पादन में वृद्धि: पूँजी प्रधान तकनीक का प्रयोग करने से श्रमिकों की उत्पादकता में वृद्धि होती है, जिससे उत्पादन में वृद्धि होती है।
IV.श्रम-शक्ति उचित प्रयोग: अर्द्धविकसित देशों में, श्रम-शक्ति की आपूर्ति अधिक होती है और यह उचित प्रयोग के लिए उपलब्ध होती है, जो श्रम-प्रधान तकनीक में संभावना नहीं होती।
V.रोजगार में वृद्धि: पूँजी-प्रधान तकनीक के प्रयोग से आर्थिक विकास तीव्र गति से होता है और इसके परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि होती है।
VI.आर्थिक और सामाजिक उपरिव्यय का विकास: पूँजी-प्रधान तकनीक का प्रयोग करने से सामाजिक और आर्थिक उपरिव्यय में विकास होता है, जो सामाजिक सुधारों के लिए महत्वपूर्ण है।
VII.प्राविधिक प्रगति के लाभ: पूँजी-प्रधान तकनीक का प्रयोग करने से प्राविधिक विकास को बढ़ावा मिलता है, जो आधुनिक तकनीकी प्रगति की ओर प्रोत्साहित करता है।
VIII.मितव्ययिताएँ: पूँजी-प्रधान तकनीक का प्रयोग बड़े पैमाने पर मितव्ययिताओं का लाभ मिलता है, जिससे वित्तीय स्थिरता में सुधार होती है।
IX.विकास प्रक्रिया का व्यापक प्रभाव: पूँजी प्रधान तकनीक से उपक्रमियों के चारों ओर विकास का व्यापक प्रभाव होता है, क्योंकि नए उद्योग और व्यवसाय खुलते हैं।
X.वातावरण का उन्नति: पूँजी-प्रधान तकनीक से वातावरण को भी बेहतर बनाने में मदद मिलती है, जिससे हमारे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है।
इन तर्कों के साथ, पूँजी प्रधान तकनीक के पक्ष में कई आर्थिक और सामाजिक लाभ हो सकते हैं।

निष्कर्ष - इस प्रकार, हम पाते हैं कि दोनों प्रकार की तकनीकों के अपने-अपने लाभ और महत्व हैं। वास्तव में, अर्द्धविकसित देशों को पूँजी-प्रधान तकनीक को विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग करने की आवश्यकता है। इसे उद्योगों और अधोसंरचना के विकास में प्रयोग किया जा सकता है, जबकि कृषि और उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में श्रम-प्रधान तकनीक का प्रयोग किया जा सकता है।

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@abcd 1 days ago

Aquí los que apoyamos a Los del limit desde sus inicios..

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